इस बार पितरो को श्राद्ध डालते वक्त रखे इस बात का खास ध्यान, पूर्वजो से मिल जाएगा धन, संपति और पैसो का वरदान

इस बार पितरो को श्राद्ध डालते वक्त रखे इस बात का खास ध्यान, पूर्वजो से मिल जाएगा धन, संपति और पैसो का वरदान

श्राद्ध पूर्वजों का सम्मान करने का कार्य है। प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। लेकिन असो शुक्ल पक्ष के 15 दिन श्राद्ध के लिए विशेष माने जाते हैं। इन 15 दिनों में पितरों की प्रसन्नता बनी रहती है तो जीवन में किसी भी चीज की कमी नहीं होती है। अक्सर गलत श्राद्ध के कारण पिता क्रोधित हो जाते हैं और शाप देते हैं। इसलिए श्राद्ध में ऐसी बातों पर इतना ध्यान देना चाहिए।

श्राद्ध की मुख्य प्रक्रिया: (१) तर्पण में दूध, तिल, फूल के मिश्रित जल से पितरों की तृप्ति होती है। (२) ब्राह्मण जमे हुए हैं और पिंडदान के माध्यम से पितरों को भोजन कराया जाता है। (३) वस्त्र दान करने से पितरों को वस्त्र प्रदान किए जाते हैं। (4) श्राद्ध का फल दक्षिणा देने से ही मिलता है।

श्राद्ध के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?: दोपहर कुटुप और रोहिन मुहूर्त श्राद्ध के लिए उत्तम हैं। कुटुप मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक। रोहिन मुहूर्त दोपहर 12:24 से 1:15 बजे तक। कुतुप काल में किए गए दान का फल मिलता है।

श्राद्ध के लिए कौन श्रेष्ठ है?: पुत्र पिता का शोक मनाता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पत्नी को श्राद्ध करना चाहिए। पत्नी की अनुपस्थिति में भाई-बहन श्राद्ध कर सकते हैं। यदि एक से अधिक पुत्र हों तो ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए।

श्राद्ध कब नहीं करना चाहिए?: रात्रि में कभी भी श्राद्ध न करें, क्योंकि रात्रि का समय आसुरी शक्ति का होता है। श्राद्ध कर्म दोनों संध्याओं में भी नहीं किया जाता है। श्राद्ध में कैसा होना चाहिए खाना : जौ, मटर और सरसों का सबसे अच्छा प्रयोग किया जाता है। अधिकांश व्यंजन पुश्तैनी पसंद के होने चाहिए। गंगाजल, दूध, शहद और तिल सबसे महत्वपूर्ण हैं।

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